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Achla Ekadashi Vrat Katha In Hindi | अपरा एकादशी व्रत कैसे करें व पूजा विधि

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दोस्‍तो आज के लेख में हम आपको Achla Ekadashi Vrat Katha के बारें में विस्‍तार से बताएगें। यह एकादशी ज्‍येष्‍ठ माह की कृष्‍ण पक्ष को आती है इसे अपरा एकादशी भी कहा जाता है। वैसे तो आप सभी जानते है, हमारे हिन्‍दु धर्म में लोग बहुत से देवी-देवताओ को मानते है लोग अपनी सभी मगंल कामनाऐ पूरी करने के लिए उनकी पूजा-अर्चना करते है। व उनका व्रत रखते है किन्‍तु जो व्‍यक्‍ति इस व्रत को करेगा। उसको ब्रह्महत्‍या, परनिन्‍दा, भूत योनि व उसके सभी निकृष्‍ट कर्मो से छुटकारा मिल जाता है। और वह इस जीवन में सुख वैभव का आनंद लेता है तथा उसके जीवन में कीर्ति, पुण्‍य व धन धान्‍य की कोई कमी नही रहती। तो आज की पोस्‍ट के माध्‍यम से हम आपको Achla Ekadashi Vrat Katha के बारें में विधि पूर्वक विस्‍तार से बताऐगें। तो चलिऐ शुरू करते है।

अचला एकादशी व्रत व पूजा विधि

यदि कोई व्‍यक्‍ति Achla Ekadashi Vrat रखता है तो उसे सबसे पहले प्रात:काल जल्‍दी उठकर स्‍नान करके, साफ वस्‍त्र धारण करे। इसके बाद सूर्य भगवान को जल चढ़ाकर पीपल के वृक्ष में भी जल चढ़ाऐ। इसके बाद मंदिर जाकर भगवान विष्‍णु जी की मूर्ति पर फूल चढ़ाऐ व उसके सामने घी का दीपक जालाऐ। अब पूरे विधि सहित भगवान की पूजा अर्चना करे आरती करे। आरती करने के बाद Achla Ekadashi Vrat Katha को पढ़े या फिर किसी अन्‍य से सुने। इस व्रत के दिन शाम के समय फलो का सागार करना चाहिऐ। और अगले दिन सुबह स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर मंदिन में पुजारी जी को सीधा देकर गाय को एक रोटी दे। इसके बाद वो भोजन कर सकता है।

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एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है एक राज्‍य था जिस पर एक राजा राज करता था । उस राजा के दो पुत्र थे, एक बड़े पुत्र का नाम महीध्‍वज व छोटे का नाम वज्रध्‍वज था। राजा का बड़ा बेटा बहुत ही धर्माता व दयावान और प्रतापी था। इस कारण राज्‍य की जनता ने उसे अपना राजा चुना और उस राजसिंहासन पर बिठा दिया। और राज्‍य में चारो तरफ खुशी ही खुशी थी। किन्‍तु जो महीध्‍वज का छोटा भाई वज्रध्‍वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा उन्‍यायी था। उसे राजसिंहासन नही मिलने के कारण वह अपने बड़े भाई को अपना दुश्‍मन समझता था।

वह राजसिंहासन पाने के लिए अपने बड़े भाई काे मारना चाहता था और एक दिन वह अपनी चाल में कामयाब हो गया। वह अपने साथ महीध्‍वज को शिकार करने के लिए ले गया। और जगंल में ही अवसर पाकर महीध्‍वज की हत्‍या कर दी और उसक शव को एक पीपल के पेड़ के नीचे दपना दिया। और राजसिंहासन पर वह बैठ गया।

महीध्‍वज की आत्‍मा पीपल के पेड़ पर वास करने लगी और आने; जाने वालों को सताने लगी। एक दिन धौम्‍य ऋषि उस पीपल के वृक्ष के नीचे से गुजर रहे थे। तब उन्‍होने अपने तपोबल से आत्‍मा का कारण व उसके जीवन का वृतांत समझ लिया। फिर ऋषि ने महीध्‍वज को पीपल के पेड़ से नीचे उतारकर परलोक सिधारने का उपदेश दिया। और कहा हे महीध्‍वज तुम प्रेत योनि से छुटकारा पाने के लिए Achla Ekadashi Vrat पूरे विधि पूर्वक करने को कहा। महीध्‍वज ने अचला एकादशी का व्रत करना शुरू कर दिया ऐस में राजा अपना दिव्‍य शरीर धारण कर स्‍वर्गलोक को चला गया।

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दोस्‍तो आज की पोस्‍ट में हमने आपको Achla Ekadashi Vrat Katha के बारे में सम्‍पूर्ण जानकारी प्रदान की है। अगर आप सभी को हमारी पोस्‍ट पंसद आयी हो तो अपने सभी दोस्‍तो के पास शेयर करे व आपके मन को किसी प्रकार का प्रश्‍न है। तो कमंट करके पूछे। धन्‍यवाद

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