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Aja Ekadashi Vrat Katha In Hindi | प्रबोधिनी एकादशी व्रत कथा | Prabodhini Ekadashi Katha | अजा एकादशी कथा

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दोस्‍तो आज के इस लेख में हम बात करेगें अजा एकादशी व्रत कथा (Aja Ekadashi Vrat Katha) के बारें में कि यह व्रत कब आता है। और इसकों क्‍यों किया जाता है। वैसे तो आप सभी जानते होगे कि हमारे हिन्‍दु धर्म में सभी औरते अपने-अपने पतियो व बेटो तथा भाइयों कि लम्‍बी उम्र कि कामना के लिए अनेक व्रत रखती है। जिनमें से एक है प्रबोधिनी (अजा) एकादशी व्रत (Prabodhini Ekadashi Vrat) जिसे करने से औरतो कि सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है। और वे सुख पूर्वक अपना जीवन व्‍यतीत करती है।

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यह व्रत भाद्रपद कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को प्रबोधिनी, जया, कामिनी तथा अजा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी सभी 24 एकादशीयो में से एक है जो अपने आप में बडा ही महत्‍व रखती है। इस दिन भगवान विष्‍णु जी की पूजा की जाती है। और रात्रि को जागरण किया जाता है। इस व्रत को रखने से सभी पाप नष्‍ट हो जाते है।

अजा एकादशी पूजन की सामग्रीया

अजा एकादशी व्रत (Aja Ekadashi Vrat) को खोलने के लिए निम्‍नलिखित सामग्रीयो कि जरूरत होती है जो कि इस प्रकार है।

  • चावल
  • रौली-मौली
  • घी का दीपक
  • पुष्‍प
  • केले
  • कलश
  • चन्‍दल व कपूर
  • एक पानी वाला नारियल
  • अगरबत्ती व धूप
  • एक लौटा जल
  • गंगा जल

अजा/प्रबोधिनी व्रत पूजा की विधि (Aja Ekadashi Vrat Pooja Vidhi)

Aja Ekadashi Vrat करने वाली सभी औरतो को प्रात:काल जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से निवृत होकर सूर्य भगवान को पानी चढ़ाऐ। उसके बाद पीपल व तुलसी के पेड़़ में जल चढाऐ। इसके बाद भवगान विष्‍णुजी जी के मंदिर जाकर नारायण जी क‍ि मूर्ति पर फूल चढ़ाऐ। अगर आपके आस-पास कोई मंदिर नही है तो आप भगवान विष्‍णु जी कि तस्‍वीर रखकर उसकी पूजा करनी चाहिए।

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Aja Ekadashi Vrat Katha
Image Pixabay
  • सबसे पहले एका लौटे में पानी लेकर उसके ऊपर नारियल पर मौली का धागा बाधकर व तिलकर करके उस पर रख देना है।
  • इसके बाद मूर्ति या तस्‍वीर के आगे घी का दीपकर/अगरबत्ती/धूप जलाऐ।
  • अब आपको भगवान विष्‍णु जी कि मूर्ति को गंगा जल से स्‍नान कराऐ।
  • स्‍नान कराने के बाद विष्‍णु भगवान का पंचामृत से अभिषेक करे और दोनो हाथ जोडकर मूर्ति के सामने बैठ जाऐ।
  • इसके बाद अजा एकादशी (प्रबोधिनी) पढ़े या फिर किसी अन्‍य से सुने।
  • कथा सुनने के बाद भगवान विष्‍णु जी क‍ि पुष्‍प व दीपकर से आरती करे, आरती करने के बाद प्रसाद लगाऐ।
  • इस दिन संध्‍या हाेने से पहले सागार करना चाहिए। तथा गरीब ब्रह्मणों को दान देना चाहिए।
  • दूसरे दिन स्‍नात आदि से मुक्‍त होकर पूजा करने के बाद गाय को एक रोटी देकर स्‍वमं को भोजन करना चाहिए।

प्रबोधिनी एकादशी व्रत कथा | Aja Ekadashi Vrat Katha

पुराणों में कहा गया है कि एक बार सत्‍यवादी राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने स्‍वप्‍न में ऋषि विश्‍वामित्र काे अपना राज्‍य दान कर दिया है। अगले दिन ऋषि विश्‍वामित्र दरबार में पहुचें तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने अपना सारा राज्‍य उन्‍हे सौप दिया। ऋषि ने दक्षिणा में राजा से पॉंच सौ स्‍वर्ण मुद्राए और मांगी। दक्षिणा चुकाने के लिए राजा ने अपनी पत्‍नी व पुत्र तथा स्‍वयं को बेचना पड़ा।

राजा हरिश्‍चन्‍द्र को एक डोम ने खरीदा था। उस डोम ने राजा हरिश्‍चन्‍द्र को श्‍मशान में नियुक्‍त करके मृतकों के सम्‍बन्धियों से कर लेकर शव का दाह करने का कार्य सौंपा था। राजा को यह कार्य करते हुऐ कई वर्ष व्‍यतीत हो गऐ, तो एक दिन अकस्‍तात् उनकी गौतम ऋषि से भेंट हो गई। तब राजा से गौतम ऋषि ने उसकी यह हालस का कारण पूछा तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने अपने ऊपर बीती सब बातें सुनाई।

राजा हरिश्‍चन्‍द्र कि बात सुनकर गौतम मुनि ने उसे अजा एकादशी (प्रबोधिनी) व्रत Aja Ekadashi Vrat करने को कहा और वहा से चले गऐ। हरिश्‍चन्‍द्र राजा ने यह व्रत करना आरम्‍भ कर दिया। राजा को यह व्रत करते हुऐ कई वर्ष व्‍यतीत हो गये, इसी बीच उनके पुत्र रोहिताश का सर्प के डसने से स्‍वर्गवास हो गया। जब उसकी माता तारा अपने पुत्र का अंतिम संस्‍कार हेतु श्‍मशान पर लायी तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने उससे श्‍मशान का कर मॉंगा।

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किन्‍तु उसके पास श्‍मशान का कर चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसकने अपनी चुन्‍दरी का आधा भाग देकर श्‍मशान का कर चुकाया। इसके बाद वह अपने पुत्र कि चितां को अग्‍नी देने के लिए आगे बढ़ी तो अचानक आकाश में बिजली चमकी और भगवान विष्‍णु जी प्रक्रट होकर बोले ” हे राजन” तुमने सत्‍य को जीवन में धारण करके उच्‍चतम आर्दश प्रस्‍तुत किया है।

तुम्‍हारी इस कर्तव्‍य और निष्‍ठा धन्‍य को देखकर मैं तुम पर प्रसन्‍न हुआ। इसी लिए तुम्‍हे इतिहास में जब तक जीवन है तब तक सत्‍यवादी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के नाम से अमर रहोगे। इसके बाद भगवान अर्तध्‍यान हो गये और उनका पुत्र रोहित जीवित हो गया। तब ऋषि विश्‍वामित्र ने उनको उनका राज्‍य वापस लौटा दिया और तीनो चिरकाल तक सुख भाेगकर अन्‍त में स्‍वर्ग को चले गए।

इसी तरी जो भी अजा एकादशी व्रत (Aja Ekadashi Vrat) पूरी श्रद्धा भाव से करता है वह इस संसार में सभी सुख भाेगकर अन्‍त में भगवान के चरणकमलों में स्‍थान प्राप्‍त करता है।

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