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Gau Giriraj Vrat Katha 2021 in Hindi | गौ गिरिराज व्रत कथा व पूजा विधि यहा से पढ़े

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दोस्‍तो गौ गिरिराज का व्रत भाद्रपद महीने की शुक्‍लपक्ष की प्रत्‍येक त्रयोदशी (तेरस) को किया जाता है। इस बार यह व्रत 19 सितम्‍बर 2021 को रविवार के दिन रहेगा। इस व्रत को रखने वाली स्‍त्रीयो के घर मै सदैव सुख, वैभव, धन हमेशा बना रहता है। गौ गिरिराज व्रत वाले दिन गाय और भगवान लक्ष्‍मीनारायण (विष्‍णुजी माता लक्ष्‍मी के पति) की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसे में आप भी गौ गिरिराज का व्रत (Gau Giriraj Vrat Katha) रखते है तो आर्टिकल के माध्‍यम से बताई हुई कथा व पूजा विधि को पढ़कर आप अपना व्रत पूर्ण कर सकते है।

Gau Giriraj Vrat Katha

गौ गिरिराज व्रत पूजा विधि (Gau Giriraj Vrat Puja Vidhi)

  • गौ गिरिराज का व्रत रखने वाली स्‍त्री को प्रात:काल जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर नऐ वस्‍त्र धारण करे।
  • इसके बाद भगवान लक्ष्‍मीनारायण का नाम ध्‍यान करते हुऐ सूर्य भगवान को पानी चढाकर पीपल व तुलसी के पेड़ में पानी चढ़ाए।
  • इसके बाद आपको पूजा के लिए केले के पत्तो से मंडप सजाकर उसमेे एक चौकी रखकर उसके ऊपर केले के पत्ते बिछ़ा देना है।
  • अब आपको भगवान लक्ष्‍मीनारायण (विष्‍णु जी) की प्रतिमा का स्‍नान कराकर चौकी के ऊपर स्‍थापित करे।
  • भगवान की प्रतिमा को स्‍थापित करने के बाद पूरे विधि-विधान से पूजा करके उसके बाद गाय माता की पूजा करे।
  • पूजा करते समय इस महामंत्र का जाप करे-

पंचगॉव समुत्‍पन्‍ना: मध्‍यमाने महोदधौ।

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तेसा मध्‍ये तु यानन्‍द तस्‍मै धेन्‍वे नमो नम:।।

अर्थात: जब क्षीर सागर में समुद्र मंथन हुआ था तो उस समय पांच गाय भी पैदा हुई थी। उनमें से एक नन्‍दा (कामधेनु) नामक गाय थी उस गाय को बारम्‍बार नमस्‍कार करे। और पुन: इस महामंत्र को पढ़कर गाय ब्राह्मण को दान करे।

गावों मामग्रम: सन्‍तु गावों में सन्‍तुपृष्‍ठत:।

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गावों में पार्श्‍वत: सन्‍तु गवॉं मध्‍ये वासभ्‍यहम।।

अर्थात: गाय मेरे आगे, पीछे रहे। गाऍं मेरे बगल में रहें और मैं गायों के बीच में सदैव निवास करता रहूॅा।

  • यह सब करने के बाद ब्राह्मण को यथा शक्ति दक्षिणा देकर आदर सत्‍कार सहित विदा करें।
  • इसके बाद स्‍वयं भोजन ग्रहण रके।

गौ गिरिराज व्रत कथा (Gau Giriraj Vrat Katha)

द्वापर युग की बात है जब भगवान विष्‍णु जी पृथ्‍वी पर धर्म की स्‍थापना के लिए जन्‍म लिया था। उस समय म‍थुरा के राजा कंस का बहुत ज्‍याद अत्‍याचार बढ़ रहे थे। एक दिन गोकुल के सभी लोग वर्षा के लिए भगवान इन्‍द्र देव की पूजा-अर्चना कर रहे थे। जब कृष्‍ण जी ने यह सब देखा तो माता यशोदा से पूछा की माता ये सब क्‍या कर रही हो। अपने लल्‍ला की बात सुनकर माता ने कहा यह तेरा काम का नही है तुम यहा से जाओ और दोस्‍तो के साथ खेलो।

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किन्‍तु भगवान कृष्‍ण जी ने पुन: पूछा तो माता यशोदा ने बताया की आज हम सब गोकुल वासी इन्‍द्र देव को प्रसन्‍न करने के लिए उनकी पूजा-अर्चना कर रहे है। ताकि वो बारिश करे और हमारे खेता में अन्‍न की पैदावार हो। उसी से हम सब अपना पेट भरते है। माता यशोदा की बात सुनकर कृष्‍ण जी ने कहा नही मैया इन्‍द्र देव हमारा पेट नही भरता।

हमारा पेट तो ये सब गाय और पर्वत पेड़-पौधे भरते है। अपने पुत्र की बात सुनकर माता ने पूछा वो कैसे- तब भगवान कृष्‍ण जी ने बताया मैया गाय हमे दूध देती है और गायो को जंगल व पर्वत खाना देते है। तो आपकाे गाय माता की पर्वत की पूजा करनी चाहिए। तब पूरे गोकुल वासीयो ने भाद्रपद महीने की शुक्‍लपक्ष की त्रयोदशी को गाय माता की पूजा करी। तब से लेकर आज तक गौ गिरिराज का व्रत रखते आ रहे है।

गौ गिरिराज व्रत की दूसरी कथा (Gau Giriraj Vrat Katha)

एक बार ऋर्षि दुर्वाशा ने इन्‍द्र देव का कमल का पुष्‍प दिया किन्‍तु इन्‍द्र ने उस कमल के पुष्‍प को अपने ऐरावत हाथी के नीचे फैक दिया। ऐरावत हाथी ने उस कमल के फुल को अपने पैरो से कुचल दिया। यह देखकर ऋर्षि दुर्वाशा ने इन्‍द्र देव सभी अमूल्‍य वस्‍तुओ स हीन होने का श्राप दिया। जिसके कारण राजा इन्‍द्र स्‍वर्ग हीन हो गया।

पेरशन होकर सभी देवतागण भगवान विष्‍णु जी के पास गऐ और अपनी कथा सुनाई। देवतागण की बात सुनकर विष्‍णु जी ने कहा हे देवगण जो ऋर्षि दुर्वाशा ने श्राप दिया है उसे मैं ले तो नही सकता किन्‍तु स्‍वर्ग पाने के कुछ उपाय है। किन्‍तु उसके लिए समुद्र मंथन करना होगा। इसके लिए हम राक्षसो की भी जरूरत है। इसके बाद देवतागण राक्षको के पास गए और कहा की तुम सब हमारे साथ समुद्र मथंन करोगे तो अमृत प्राप्‍त होगा।

जो कोई उस अमृत को पीएगा वह इस संसार में अमर हो जाएगा। यह सुनकर सभी राक्षसगण मंथन के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन क्षीर सागर (हिन्‍द सागर) में हुआ। समुद्र मंथन के लिए मध्‍राचंल क‍ि पर्वत को समुद्र में डाला गया किन्‍तु वह दूबने लगा। फिर भगवान विष्‍णु जी ने कछुए का रूप धारण कर पर्वत का आधार बन गए। और वासु की नाग को रस्‍सी बनाकर एक तरफ से देवता व एक तरफ से राक्षस खीचने लग।

Gau Giriraj Vrat Katha

इसके बाद इस समुद्र मंथन से 14 रत्‍न प्राप्‍त हुए सबसे पहले जहर जो भगवान शंकर जी ने पी लिया। विष पीते समय कुछ बूदे धरती पर घिर गई जिससे जहरीले किड़े उत्‍पन्‍न हुऐ। दूसरा कामधेनू गाय जो पांचो गायो में से सर्वश्रेष्‍ठ थी। उसी गाय के लिए पूजा-अर्चना के लिए गौ गिरिराज का व्रत रखा जाता है।

दोस्‍तो आज के इस लेख में हमने आपको गौ गिरिराज व्रत (Gau Giriraj Vrat Katha) के बारे में सभी जानकारी प्रदान की है। यदि आप सभी को हमारे द्वारा प्रदान की गई जानकारी पसंद आई हो तो लाईक करे व अपने मिलने वाले के पास शेयर करे। यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे।

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