Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi | गोवत्‍स द्वादशी व्रत कथा व पूजा विधि यहा से जाने

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Govatsa Dwadashi Vrat 2022:- यह द्वादशी हर वर्ष कार्तिक महीने की कृष्‍णपक्ष की द्वादशी को आती है दिपावली जैसे महापर्व के ठीक चार दिन पहले गोवत्‍स द्वादशी मनाई जाती है। इस दिन गाया व बछड़ा दोनो की पूजा करने का विधान है उन्‍हे पूजने के बाद गेहूँ से बने पदार्थ खाने को देना चाहिए। इस दिन गाय का दूध, व गेहूँ के बने पदार्थ (भोजन) का प्रयोग वर्जित है। कटे फल का सेवन नही करना चाहिए तथा पूजा करने के बाद गोवत्‍स द्वादशी व्रत की कथा सुनकर ब्रह्मणों को फल देना चाहिए। आप भी गोवत्‍स द्वादशी का व्रत (Govatsa Dwadashi Vrat) रखते है तो हमारे द्वारा बताई लिखी गई पूजा विधि, शुभ मुहूर्त एवं व्रत कथा पढ़कर अपन व्रत पूर्ण करें।

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गोवत्‍स द्वादशी (Govatsa Dwadshi Vrat)

इस द्वादशी वाले दिन व्रत रखने वाली सभी औरते गाय माता व बछड़े की पूजा करती है। इसका उल्‍लेख शास्‍त्रो में मिला है मान्‍यताओं के अनुसार इस द्वादशी वाले दिन माता यशोदा ने गाय माता व बछड़े की पूजा की थी। और यह व्रत प्रतिवर्ष दीपावली का त्‍यौहार (Deepawali Festival) के 4 दिन पहले किया जाता है। यह द्वादशी भगवान विष्‍णु (Lord Vishnu ji) जी को समर्पित है इसलिए जो कोई व्‍यक्ति श्रद्धा भाव से यह व्रत करता है भगवान उसकी सभी इच्‍छाएं पूर्ण करता है। हमारे यहा पर गोवत्‍स द्वादशी व्रत को गौ बारस (Go Baras Vrat) व्रत के नाम से जाना जाता है।

Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi
Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi

Govatsa Dwadashi 2022 Date (गोवत्‍स द्वादशी कब है)

  • गोवत्‍स द्वादशी व्रत तिथि प्रारंभ:- 21 अक्‍टूबर 2022 को संध्‍या के 05:22 मिनट पर
  • गोवत्‍स द्वादशी व्रत तिथि समाप्‍त:- 22 अक्‍टूबर 2022 शाम 06:02 मिनट पर
  • उदयातिथि के अनुसार द्वादशी व्रत:- 21 अक्‍टूबर 2022 शुक्रवार

वैसे तो गोवत्‍स द्वादशी का व्रत प्रतिवर्ष हिन्‍दु कैलेंड़र के अनुसार कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की द्वादशी (बारस) तिथि को किया जाता है। पंचाग के अनुसार इस वर्ष गोवत्‍स द्वादशी व्रत 21 अक्‍टूबर 2022 शुक्रवार के दिन किया जाएगा। इस व्रत की शुरूआत 21 अक्‍टूबर शाम 05:22 मिनट से हो जाती है और 22 अक्‍टूबर को शाम 06:02 को समाप्‍त हो जाता है।

Govatsa Dwadashi Vrat Vidhi (गोवत्‍स द्वादशी व्रत पूजा विधि)

  • इस व्रत वाले दिन प्रात: जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर साफ वस्‍त्र धारण करें, उसके बाद भगवान सूर्य को जल का अघ्‍र्य दे और पीपल के वृक्ष व तुलसी वृक्ष में भी पानी अवश्‍य चढ़ाए।
  • उसके बाद आपको मान्‍यताओं के अनुसार गाय माता व उसके बछड़े की पूजा विधिवत रूप से करें और इस व्रत का संकल्‍प करें।
  • सबसे पहले आपको गाय माता व उसके बछड़े को पुष्‍प माला पहनाये उसके बाद तिलक आदि करके पूजा करें।
  • पूजा करते समय इस मंत्र का धारण करें-

क्षीरोदार्णवसम्‍भूते सुरासुरनमस्‍कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्‍य नमो नम:।।

  • पूजा करने के बाद गाय माता को व बछ़ड़े को पकवान के रूप में भोग लगाऐं। और इस मंत्र का जाप करें

सुरभि त्‍वं जगन्‍मातर्देवी विष्‍णुपदे स्थ्ति। सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस।।

तत: सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते। मातर्ममाभिलाषिंत सफलं कुरू नन्दिनी।।

  • इतना करने के बाद व्रत रखने वाले सभी भक्‍तों को गोवत्‍स द्वादशी व्रत कथा (Govatsa Dwadashi Vrat katha in Hindi) सुने, और अपना व्रत पूर्ण करें।
  • इसके बाद गोवत्‍स द्वादशी व्रत का पारण करें।

Govatsa Dwadashi Vrat Katha (गोवत्‍स द्वादशी व्रत की कथा)

Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi:- प्राचीन समय में सुवर्णसुर नगर में देवदानी नामक राजा का राज था। जिसके दो रानिया सीता और गीता थी। तथा उस राजा ने एक बैंस और एक बछ़डा भी पाल रखा था। राजा की पहली रानी सीता भैस की देखभाल करती थी। तथा दूसरी पत्‍नी गीता उस बछड़े का देखभाल करती थी। तथा वह उस बछडे पर अपने पुत्र समान रस बरसाती (प्‍यार करती) थी।

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एक दिन भैंस ने चुगली कर दी कि गीता रानी मुझसे ईर्ष्‍या करती है। ऐसा सुनकर सीता ने गाय के बछड़े को मारकर गेहूँ के डेर में छुपा दिया। रात्रि में जब राजा भोजन करने बैठा तब मॉस की वर्षा होने लगी। राजा के महल के अन्‍दर तथा बाहर चारो ओर रक्‍त और मॉस दिखाई देना लगा। और जिस थाली में भोजन परोसा गया था उस थाली में मल- मूत्र हो गया।

यह देखकर राजा आश्‍चर्य में पड़ गया और कुछ भी समझ नही आ रहा था, की यह सब क्‍या हो रहा है। तथी अचानक आकाशवाणी हुई कि हे राजन तुम्‍हारी रानी सीता ने गाय के बछड़े को मारकर गेहॅू के डेर में छुपा दिया है। और कल गोवत्‍स द्वादशी है। तुम इस भैस को राज्‍य से बाहर करके गोवत्‍स पूजा करो और इस व्रत को पूरे नियामो के अनुसार पूरी श्रद्धा से करो।

यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम्‍हारे इस तप से वह बछड़ा पुन: जीवित हो जाऐगा। इसके बाद दूसरे दिन राजा ने गोवत्‍स पूजा पूरे विधि-विधान से की तथा पूरी श्रद्धा के अनुसार पूजा की। और अपने मन ही मन में उस बछडे को याद किया। जैसे ही राजा ने बछड़े को याद किया तो वह बछड़ा गेहू के ढेर से निकलकर बाहर आ गया। यह देखकर राजा प्रसन्‍न हो गया। और राजा ने अपने पूरे राज्‍य में आदेश दिया की नगर के सभी निवासी गोवत्‍स द्वादशी व्रत का पालन करेगे।

दोस्‍तो आज के इस लेख में हमने आपको गोवत्‍स द्वादशी व्रत कथा Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi के बारे में बताया है। यह जानकारी आपको पौराणिक मान्‍यताओ के आधार पर बताई है। ऐसे में आपको लेख में बताई हुई कथा अच्‍छी लगी हो तो लाईक करे व अपने मिलने वालो के पास शेयर करे। और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमेंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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