Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi | गोवत्‍स द्वादशी व्रत कथा व पूजा विधि यहा से जाने

Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi:– कार्तिक मास की कृष्‍णपक्ष की द्वादशी (बारस) को गोवतस द्वादशी (गाय व बछड़ा) मनाई जाती है। इस दिन गाया व बछड़ को पूजने का विधान है उन्‍हे पूजने के बाद गेहूँ से बने पदार्थ खाने को देना चाहिए। इस दिन गाय का दूध, व गेहूँ के बने पदार्थ (भोजन) का प्रयोग वर्जित है। कटे फल का सेवन नही करना चाहिए तथा पूजा करने के बाद गोवत्‍स द्वादशी व्रत की कथा सुनकर ब्रह्मणों को फल देना चाहिए।

गोवत्‍स द्वादशी व्रत का महत्‍व/Govatsa Dwadashi Vrat ka Mabatva

हमारे धर्म में मान्‍यता है की गाय माता है जिसमें 33 कोटि देवी-देवताओं का वास बताया गया है। इसीलिए पुण्‍य फल पाने के लिए आदमी को सदैव गाय माता की पूजा करनी चाहिए उसकी सेवा करनी चाहिए। भविष्‍य पुराण के अनुसार गोवत्‍स द्वादशी पर गाय माता और उसके बछड़े की पूजा करी जाती है हम पुराणे धार्मिक कथाओं, ग्रंथों में देखते है की गाय माता को सर्वश्रेष्‍ठ माता बताया गया है। भगवान कृष्‍ण जी का जन्‍म होने के बाद माता यशोदा जी ने भी गाय माता का दर्शन व पूजा किया था।

Govatsa Dwadashi Vrat Katha

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गोवत्‍स द्वादशी व्रत कब है

पंचांग के अनुसार कार्तिक महिने की कृष्‍ण पक्ष की द्वादशी तिथि को भी गोवत्‍स द्वादशी कहा गया है इस साल यह द्वादशी 09 नवंबर 2023 को पड़ रही है

गोवत्‍स द्वादशी शुभ मुहूर्त (Govatsa Dwadashi Vrat Shubh Muhurat)

  • द्वादशी तिथि आरंभ:- प्रात:काल 10:40 मिनट पर (09 नवंबर 2023)
  • द्वादशी तिथि समाप्‍त:- दोपहर 12:35 मिनट पर (10 नवंबर 2023)
  • गोवत्‍स द्वादशी कब है:- 09 नवंबर 2023 गुरूवार को

गोवत्‍स द्वादशी पूजा विधि Govatsa Dwadashi Puja Vidhi

  • कार्तिक महिने की द्वादशी तिथि‍ (Kartik Month Dwadashi) वाले दिन आपको प्रात:काल जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से निवृत्त होकर साफ वस्‍त्र धारण करना चाहिए।
  • उसके बाद भगवान सूर्य और पीपल व तुलसी के वृक्ष में पानी अवश्‍य चढ़ाए।
  • उसके बाद आपको दूध देने वाली गाय की पूजा करनी है
  • सबसे पहले आपको गाय माता के खूंटे पर पानी चढ़ाकर, गाय माता का चंदन का तिलक करें।
  • उसके बाद धूप, अक्षत, नैवेद्य आदि से पूजा करें।
  • उसके बाद भोजन में रोटी और गुड़ फिर आंटे की लोई के सााि गुड़ मिलाकर अवश्‍य खिलाएं।
  • उसके बाद गाय माता को प्रमाण अवश्‍य करें।

Govatsa Dwadashi Vrat Katha (गोवत्‍स द्वादशी व्रत की कथा)

प्राचीन समय में सुवर्णसुर नगर में देवदानी नामक राजा का राज था। जिसके दो रानिया सीता और गीता थी। तथा उस राजा ने एक बैंस और एक बछ़डा भी पाल रखा था। राजा की पहली रानी सीता भैस की देखभाल करती थी। तथा दूसरी पत्‍नी गीता उस बछड़े का देखभाल करती थी। तथा वह उस बछडे पर अपने पुत्र समान रस बरसाती (प्‍यार करती) थी।

एक दिन भैंस ने चुगली कर दी कि गीता रानी मुझसे ईर्ष्‍या करती है। ऐसा सुनकर सीता ने गाय के बछड़े को मारकर गेहूँ के डेर में छुपा दिया। रात्रि में जब राजा भोजन करने बैठा तब मॉस की वर्षा होने लगी। राजा के महल के अन्‍दर तथा बाहर चारो ओर रक्‍त और मॉस दिखाई देना लगा। और जिस थाली में भोजन परोसा गया था उस थाली में मल- मूत्र हो गया।

यह देखकर राजा आश्‍चर्य में पड़ गया और कुछ भी समझ नही आ रहा था, की यह सब क्‍या हो रहा है। तथी अचानक आकाशवाणी हुई कि हे राजन तुम्‍हारी रानी सीता ने गाय के बछड़े को मारकर गेहॅू के डेर में छुपा दिया है। और कल गोवत्‍स द्वादशी है। तुम इस भैस को राज्‍य से बाहर करके गोवत्‍स पूजा करो और इस व्रत को पूरे नियामो के अनुसार पूरी श्रद्धा से करो।

यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम्‍हारे इस तप से वह बछड़ा पुन: जीवित हो जाऐगा। इसके बाद दूसरे दिन राजा ने गोवत्‍स पूजा पूरे विधि-विधान से की तथा पूरी श्रद्धा के अनुसार पूजा की। और अपने मन ही मन में उस बछडे को याद किया। जैसे ही राजा ने बछड़े को याद किया तो वह बछड़ा गेहू के ढेर से निकलकर बाहर आ गया। यह देखकर राजा प्रसन्‍न हो गया। और राजा ने अपने पूरे राज्‍य में आदेश दिया की नगर के सभी निवासी गोवत्‍स द्वादशी व्रत का पालन करेगे।

डिस्‍कलेमर:- दोस्‍तो आज के इस लेख में हमने आपको गोवत्‍स द्वादशी व्रत कथा Govatsa Dwadashi Vrat Katha in Hindi के बारे में बताया है। यह आपको पौराणिक मान्‍यताओं व कथाओं के आधार पर लिखकर बताया है। आपको बताना जरूरी है Onlineseekhe.com किसी प्रकार की पुष्टि नहीं करता है विशेष जानकारी के लिए आपको किसी संबंधित सलाहाकार, प‍ंडित, विद्धान के पास अवश्‍य जाएगा। ऐसे में आपको लेख में बताई हुई कथा अच्‍छी लगी हो तो लाईक करे व अपने मिलने वालो के पास शेयर करे। और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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