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Padmanabha Dwadashi Vrat Katha in Hindi | पद्मनाभ द्वादशी व्रत कथा व पूजा विधि यहा से पढ़े

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Padmanabha Dwadashi Vrat Katha in Hindi | पद्मनाभ द्वादशी व्रत कथा | Padmanabha Baras Vrat katha | पद्मनाभ बारस व्रत की कथा | Aaj ki Baras Katha Read in Hindi | आज की द्वादशी व्रत कथा पढ़े

दोस्‍तो वैसे तो आप सभी जानते है हमारे हिन्‍दु पंचाग के अनुसार प्रतिमाह दो द्वादशीया आती है। किन्‍तु हर द्वादशी अपने आप में बड़ा महत्‍व रखती है। जिनमे से एक है पद्मनाभ द्वादशी। यह द्वादशी प्रतिवर्ष आश्विन महीने की शुक्‍ल पक्ष की द्वादशी (बारस) को आती है। इस बार यह 17 अक्‍टूबर 2021 रविवार के दिन पड़ रही है। यह द्वादशी पापांकुशा एकादशी के दूसरे दिन है।

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आपको बता दे विष्‍णु पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्‍णु जी जाग्रत अवस्‍था में आने के लिए अंगडाई लेते है और पद्मम पर बैठे हुऐ ब्रह्माजी ऊॅा उकार की ध्‍वनी निकाले के कारण इस द्वारदशी को पद्मनाभ द्वादशी कहते है। जो कोई स्‍त्री व पुरूष इस दिन पूरी श्रद्धा के अनुसार भगवान विष्‍णु जी की पूजा-अर्चना करता है उसकी सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है।

इस द्वादशी वाले दिन भगवान पद्मनाभ (विष्‍णु भगवान) की पूजा की जाती है। ऐसे में अगर आप भी अपनी मनोकामनाए पूर्ण करने हेतु पद्मनाभ द्वादशी का व्रत रखते है तो आर्टिकल में दी गई व्रत कथा व पूजा विधि को पढ़कर या किसी अन्‍य से सुनकर आप अपना व्रत पूर्ण कर सकते है तो पोस्‍ट के अन्‍त तक बने रहे।

पद्मनाभ द्वादशी व्रत का महत्‍व (Padmanabha Dwadashi ka Mahavt)

हिन्‍दी पंचाग के अनुसार पद्मनाभ द्वादशी 17 अक्‍टूबर 2021 रविवार के दिन पड़ रही है। इस दिन जो कोई पूरे विधि-विधान से यह व्रत रखता है तो उसके ऊपर माता भगवती (लक्ष्‍मी) जी अपनी कृपा बनाऐ रखती है। उसके घर में सदैव सुख सम्‍पति बनी रहती है। इसके अलावा जो काई यह व्रत रखता है भगवान विष्‍णु जी उसे जन्‍म-मरण के चक्र से छुटाकरा देता है। और सदैव अपने चरणों में जगह प्रदान करता है।

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पद्मनाभ द्वादशी व्रत की पूजा विधि (Padmanabha Dwadashi Vrat Puja Vidhi)

  • इस व्रत को रखने वाले स्‍त्री व पुरूष को प्रात:काल ब्रह्मा मुहूर्त में उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर नऐ वस्‍त्र धारण करे।
  • इसके बाद भगवान सूर्य को पानी चढा़कर पीपल के पेड़ और तुलसी के पेड़ में पानी चढाना चाहिए।
  • इसके बाद भगवान विष्‍णु जी की शैया पर लेटी हुई मूर्ति को स्‍थापित करे और उसके बाद उसकी पूरे विधि-विधान से पूजा करे।
  • पूजा करने पद्मनाभ द्वादशी व्रत कथा (Padmanabha Baras Vrat Katha) को पढ़े जिसके बाद भगवान की आरती करे।
  • आरती करने के बाद विष्‍णु जी को प्रसाद चढाकर प्रसाद का वितरण करे।

पद्मनाभ द्वादशी व्रत का शुभ मुहूर्त (Dwadashi Vrat ka Shub Muhrat 2021)

हिदीं पंचाग के तहत पद्मनाभ द्वादशी तिथि की शुरूआत 16 अक्‍टूबर 2021 शनिवार को शाम 05 बजकर 37 मिनट पर हो रही है। तथा 17 अक्‍टूबर 2021 को 05 बजकर 40 मिनट पर समाप्‍त हो रही है। वही आप इन सभी मुहूर्त के तरीके से द्वादशी व्रत की पूजा कर सकते है।

  • ब्रह्मा मुहूर्त:- प्रात:काल 04:48 मिनट से लेकर सुबह 05:38 मिनट तक
  • अभिजित मुहूर्त:- सुबह 11:48 मिनट से लेकर 12:33 मिनट तक
  • गोधूलि मुहूर्त:- शाम 05:42 मिनट से लेकर 06:06 मिनट तक
  • त्रिपुष्‍कर योग:- सुबह 09:53 मिनट से लेकर शाम 05:39 मिनट तक

नोट:- आपकी जानकारी के अनुसार बता दे की आपको यह व्रत राहुकाल से पहले खोलना है। राहुकाल का समय शाम 04 बजकर 27‍ मिनट से शुरू हाे रहा है जो 05 बजकर 53 मिनट पर समाप्‍त हो रहा है। क्‍योकि इस काल को अशुभ माना गया है।

पद्मनाभ द्वादशी व्रत कथा (Padmanabha Dwadashi Vrat katha in Hindi)

सत्‍युग की बात है भद्राश्रव नामक एक राजा जो बहुत ही शक्तिशाली था। उसकी प्रजा सभी प्रकार के सुख भोग रही थी। एक दिन राजा के यहा अगस्‍त मुनि आऐ, राजा भद्राश्रव ने उनका भव्‍य स्‍वागत किया। राजा ने विनम्र भाव से ऋषि का आने का कारण पूछा तो ऋषि ने कहा हे राजन मैं तुम्‍हारे इस महले में सात राते गुजारूगा। उसके बाद मैं अपने आश्रम को चला जाऊगा।

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राजा ने अगस्‍त मुनि के रहने की व्‍यवस्‍था की। और अपने दोनो हाथ जोड़कर कहा हे मुनिवर आप चाहे जितने दिन यहा रूक सकते है। वही राजा भद्राश्रव की पत्‍नी रानी कान्तिमंती जो बहुत ही सुन्‍द थी। उसके मुख पर ऐसा प्रकाश था मानो कई सूर्य एक साथ मिलकर प्रकाश फैला रहे हो।

इसके अलावा राजा के 500 सुन्‍दरियॉं और थी किन्‍तु राजा की पटरानी बनने का सौभाग्‍य केवल रानी कान्तिमंती को मिला था। जब प्रात हुई तो रानी अपनी दासी के साथ अगस्‍त मुनि को प्रणाम करने आई जब ऋ‍षि की दृष्टि कांन्तिमंती और दासी पर पड़ी तो वह देखता ही रह गया।

ऐसी परम सुन्‍दरी रानी और दासी को देखकर अगस्‍त मुनि आनन्‍द में विह्ल होकर बोले हे राजन आप धन्‍य है। इसी तरह दूसरे दिन भी रानी को देखकर अगस्‍त मुनि बोले अरे यहा तो सारा विश्‍व वज्ज्ति रह गया। तथा तीसरे दिन रानी को देखकर पुन: ऋषि ने कहा ”अहो ये मुर्ख गोविन्‍द भगवान को भी नही जानते,

जिन्‍होने केवल एक दिन की प्रसन्‍नता से इस राजा को सब कुछ प्रदान किया था। फिर चौथे दिन रानी को देखकर ऋषि ने अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाते हुऐ कहा ‘जगतप्रभु’ आपको साधुवाद है , स्त्रिया धन्‍य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्‍य। तुम्‍हे पुन: पुन: धन्‍यवाद है। भद्राश्रव तुम्‍हे धन्‍यवाद है।

और कहा हे अगस्‍त तुम भी धन्‍य हो। प्रह्लाद एवं महाव्रती , ध्रवु तुम सभी धन्‍य हो। इस प्रकार उच्‍च स्‍वर में कहकर अगस्‍त्‍य मुनि राजा भद्रश्रव के सामने नाचने लगा। राजा यह देखकर ऋषि से पूछा हे भगवन आप इस तरह क्‍यों नृत्‍य कर रहे हो। राजा की बात सुनकर मुनि बोला राजन बड़े आर्श्‍चय की बात है। की तुम कितने अज्ञानी हो। और साथ ही तुम्‍हारे अनुगमन करने वाले ये मंत्री, पुरोहित आदि अनुजीवी भी मुर्ख है

Baras Vrat Katha in Hindi

जो मेरी बात को समझ ही नही पाते। ऋषिवर की बात सुनकर राजा ने अपने दोनो हाथ जोडकर कहा हे मुनिश्रेष्‍ठ आपके मुख से उच्‍चरित पहेली को हम नही समझ पा रहे है। अत: कृपा करके मुझे इसका मतलब बताइऐ। राजा की बात सुनकर अगस्‍त्‍य मुनि बोले हे राजन मेरी पहेती तुम्‍हारी इस सुन्‍दर रानी के ऊपर है जो यह है।

राजन पूर्व जन्‍म में यह रानी किसी नगर में हरिदत्त नामक एक वैश्‍या के घर में दासी का काम करती थी। उस जन्‍म में भी तुम ही इसके पति रूप में थे। और तुम भी हरिदत्त के यहा सेवावृत्त‍ि से एक कर्मचारी थे। एक बार वह वैश्‍य तुम्‍हारे साथ आश्विन माह की शुक्‍लपक्ष की द्वादशी को भगवान विष्‍णु जी के मंदिर जाकर पूजा अराधना की।

उस समय तुम दोनो वैश्‍य की सुरक्षा के लिए साथ थे। पूजा करने के बाद वह वैश्‍य तो अपने घर लौट गया किन्‍तु तुम दोनो मंदिर में ही रूक गऐ। क्‍योकि वैश्‍य ने तुम्‍हे आज्ञा दी थी की कही मंदिर का दीपक बुझ नही जाऐ। वैश्‍य के जाने के बाद तुम दोनो दीपक को जलाकर उसकी रक्षा के लिए वही बैठे रहे।

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और ऐसे में पूरी एक रात तक तुम उस दीपक की रखवाली के लिए बैठै रहे। कुछ दिनो के बाद दोनो की आयु समाप्‍त होने पर तुम दोनो की मृत्‍यु हो गई। उसी पुण्‍य प्रभाव से राजा प्रियवत के पुत्र रूप में तुमने जन्‍म लिया। और तुम्‍हारी वह पत्‍नी जो उस जन्‍म में वैश्‍य के यहा दासी थी।

अब एक राजकुमारी के रूप में जन्‍म लेकर तुम्‍हारी पत्‍नी बनी। क्‍योकि भगवान विष्‍णु जी के मंदिर में उस दीपकर को प्रज्‍वलित रखने का काम तुम्‍हारा था। जिस के फल से आज तुम्‍हे यह सब प्राप्‍त है। फिर मुनि ने कहा हे राजा अब कार्तिक की पूर्णिमा का पर्व आ गया है। मैं उसी पर्व के लिए पुष्‍कर (राजस्‍थान के अजमेर जिले) जा रहा था। और रास्‍ते में मैं यहा रूक गया।

अब आप दोनो मुझे विदा दिजीऐ। राजा और रानी ने अगस्‍त्‍य मुनि के पैर छूकर आशीर्वाद स्‍वरूप पुत्र रत्‍न प्राप्‍ति का वर लिया। और आर्शीवाद देते हुए ऋषिवर वहा से पुष्‍कर के लिए चले दिऐ। तो यह भी पद्मनाभ द्वादशी व्रत की कथा जिसके सुनने मात्र से ही आपको फल प्राप्‍ति का वर मिलता है।

दोस्‍तो आज के इस आर्टिकल में हमने आपको पद्मनाभ द्वादशी व्रत (Padmanabha Dwadashi Vrat katha in Hindi) के बारे में विस्‍तार से बताया है। ऐसे में ऊपर लेख में दी गई सभी जानकारी पंसद आई हो तो लाईक करे व अपने मिलने वालो के पास शेयर करे। और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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