Rukmini Ashtami Vrat Katha in Hindi | रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत कथा, पूजा विधि जाने शुभ मुहूर्त महत्‍व

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Rukmini Ashtami 2021 in Hindi | रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत कथा, पूजा विधि जाने शुभ मुहूर्त महत्‍व | Rukmani Ashtami Vrat Katha | रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत कथा | Rukmini Ashtami 2021 | रूक्मिणी व्रत की कथा पढ़े | Rukmini Ashtami vrat katha in hindi

Rukmini Ashtami Vrat Katha:- रूक्मिणी अष्‍टमी हर वर्ष पौष महीने की कृष्‍णपक्ष की अष्‍टमी को आती है। और इस साल क्रिसमस डे त्‍यौहार के दूसरे दिन अर्थात 26 दिसबंर को है। इस दिन देवी रूक्मिणी का व्रत रखा जाता है तभा भगवान कृष्‍ण जी व रूक्मिणी की पूजा का विधान होता है। मान्‍यताओं के अनुसार रूक्मिणी अष्‍टमी का व्रत पूरे नियमों से करता है उसके जीवन में सभी कष्‍ट दूर हो जाते है। ऐसे में आप भी इस अष्‍टमी का व्रत रखते है तो पोस्‍ट के अंत तक बने रहे।

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रूक्मिणी अष्‍टमी का महत्‍व (Rukmini Ashtami in Hindi

Rukmini Ashtami Vrat Katha
Rukmini Ashtami Vrat Katha

पुराण, शास्‍त्रों के अनुसार पौष मास की कृष्‍णपक्ष की अष्‍टमी को ही माता लक्ष्‍मी ने देवी रूक्मिणी के रूप में जन्‍म लिया था। और उनकी जन्‍मदिन के इस उपल्‍क्ष में प्रतिवर्ष रूक्मिणी अष्‍टमी मनाई जाती है। जो कोई स्‍त्री रूक्मिणी अष्‍टमी का व्रत करती है तो उस पर देवी हमेशा अपनी कृपा बनाए रखती है और उसकी सभी मनोकामनाए पूर्ण करती है।

रूक्मिणी अष्‍टमी कब है (Rukmini Ashtami Kab Hai)

हिन्‍दी पंचाग के अनुसार प्रत्‍येक वर्ष रूक्मिणी अष्‍टमी का व्रत पौष मास की कृष्‍णपक्ष की अष्‍टमी को किया जाता है। और इस वर्ष रूक्मिणी अष्‍टमी का व्रत 26 दिसबंर 2021 या 27 दिसबंर 2021 को रखा जाएगा। क्‍योंकि ज्‍योतिषों के अनुसार इन दोनो तारीखों पर ही अष्‍टमी पड़ रही है अर्थात इस बार अष्‍टमी दो दिन की है।

रूक्मिणी अष्‍टमी का शुभ मुहूर्त (Rukmani Ashtami Shub Muhurat)

इस वर्ष रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत की शुरूआत 26 दिसबंर 2021 रविवार के दिन प्रात: 09:35 पर होगी। और इसका समापन 27 दिसबंर 2021 सोमवार के दिन प्रात: 09:00 पर होगी। आप इसी शुभ मुहूर्त के बीच में रूक्मिणी अष्‍टमी का व्रत रख सकते है और अपना व्रत का पारण करके उस पूर्ण कर सकते है।

रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत पूजा विधि (Rukmini Ashtami Vrat Puja Vidhi)

  • व्रत रखने वाली स्‍त्रिया प्रात: जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर साफ वस्‍त्र धारण करे। जिसके बाद भगवान सत्‍यनारायण को पानी चढाकर पीपल व तुलसी के पेंड में पानी चढ़ाऐ। क्‍योंकि मान्‍यताओं के अनुसार पीपल में भगवान विष्‍णु जी का तथा तुलसी में माता लक्ष्‍मी जी का वास होता है।
  • जिसके बाद घर के किसी स्‍थान पर गंगाजल छिडकर एक चौकी की स्‍थापना करे और इस पर लाल रंग का कपड़ा बिछा देना है।
  • इस चौकी पर सर्वप्रथम भगवान गणेश की स्‍थापना करे जिसके बाद भगवान कृष्‍ण जी व देवी रूक्मिणी की मूर्ति को स्‍थापित करे।
  • चौकी के एक ओर शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी का कलश रख देना है। जिसके ऊपर आम, अशोक के पत्तें रखकर एक नारियाल रखना है।
  • सबसे पहले आपको भगवान गणेश जी की पूजा करनी चाहिए, जिसके बाद भगवान कृष्‍ण जी व देवी रूक्मिणी की प्रतिमा का जल से स्‍नान कराए। जिसके बाद उनका अभिषेक करे और पूजा करे।
  • पूजा में फल, फूल, रौली-मौली, चावल, सुपारी, लॉग, नैवेद्य, अक्षत, चंदन, धूप, दीप आदि से करे। पूजा के दौरान भगवान कृष्‍ण जी को पीले रंग के वस्‍त्र अर्पित करे और माता रूक्मिणी (लक्ष्‍मीस्‍वरूपा) को लाल रंग के वस्‍त्र चढा़ऐ तथा साथ में श्रृंगार का पूरा सामान भी चढ़ाऐ।
  • पूजा के बाद रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत की कथा सुने और आरती करे।
  • जिसके बाद माता व भगवान को खीर व अन्‍य पकवानों का प्रसाद चढ़ाकर वहा मौजूद सभी में वितरण कर देना है।
  • अष्‍टमी के दूसरे दिन अर्थात नवमी वाले दिन स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथा शक्ति‍ दान-दक्षिणा देकर विदा करे।
  • जिसके बाद गाय माता को भोजन देकर स्‍वयं भोजन ग्रहण करे।

रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत कथा (Rukmini Ashtami Vrat Katha in Hindi)

द्वापर युग में विदर्भ देश के राजा भीष्‍मक के यहा एक अति सुनंद पुत्री ने जन्‍म लिया। जन्‍म कें समय राजा की पुत्री इसती गुणवान व सुनदर लग रही थी मानो साक्षात माता लक्ष्‍मी ने उसके घर में जन्‍म लिया है। राजा ने उसका नाम रूक्मिणी रखा। राजकुमारी रूक्मिणी के पांच भाई थे- रूक्‍म, रूक्‍मरथ, रूक्‍मबाहु, रूक्‍मकेश और रूक्‍ममाली ।

धीरे-धीरे राजकुमारी रूक्मिणी बड़ी होती गई और उसकी शरीर की सुन्‍दरता व मुख का तेज और चकमा गया तो उसे सभी लोक लक्ष्‍मीस्‍वरूपा मानते थे। रूक्मिणी ज्‍यादातर अपने पिता भीष्‍मक के साथ रहती थी। उस समय राजा से कोई भी मिलने आता तो वह श्री कृष्‍ण जी की प्रशंसा करता और भगवान विष्‍णु जी की तरह उसके शरीर के गुणगान करते। श्री कृष्‍ण जी की प्रशंसा सुनकर रूक्मिणी ने मन ही मन में कृष्‍ण जी का अपने पति रूप में चुन लिया।

किन्‍तु रूक्मिणी का बड़ा भाई रूक्‍म अपने खास मित्र चेदिराज शिशुपाल से उसका विवाह कराके अपनी मित्रता को और भी गहरी करना चाहते थे। राजा भीष्‍मक व उसकी रानी ने अपने पुत्र रूक्‍म को बहुत समझाया किन्‍तु वह उनके प्रति जाकर अपने मित्र शिशुपाल से रूक्मिणी का विवाह तय कर दिया। जिसके बाद राजकुमारी रूक्मिणी बहुत दुखी हुई। और कुछ दिनों के बाद शादी की तारीख तय हो गई।

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पूरे राज्‍य में राजकुमारी रूक्मिणी के विवाह की तैयारी होने लगी तब रूक्मिणी ने अपने कुल गुरू को अपना सदेंश दिया और कहा की हे गुरूदेव आप शीघ्र की द्वारीका नगरी जाइये। और हमारा सदेंश भगवान कृष्‍ण जी को देना। जिसके बाद कुल गुरू द्वारीका नगरी गऐ और श्री कृष्‍ण जी को वह सदेंश देते हुए सारा वृत्तात सुना दिया। कृष्‍ण जी ने सदेंश को खोलकर पढ़ा तो

राजकुमारी रूक्मिणी ने लिखा हुआ था हे द्वारीकानंदन मैने आप ही को अपने पति रूप में चुना है और मरे बड़े भैया मेरा विवाह उनके परम मित्र शिशुपाल के साथ करना चाहते है किन्‍तु मैने तो आपको पति रूप में चुना है मैं किसी और से विवाह नहीं कर सकती कृपा करके मुझे अपने चरणों की दासी स्‍वीकार करे। यदि आप मुझे अपने पत्‍नी रूप में रूवीकार नहीं करेगे तो मैं अपने प्राण त्‍याग दूगी। यह पढ़कर कृष्‍ण जी ने उस कुल गुरू से कहा राजकुमारी से कहना की वाे राज्‍य के बाहर हमारी प्रतिक्षा करे।

जिसके बाद कुल गुरू राजकुमारी के पास आया और बोला की तुम विवाह से पहले गौरी पूजा के लिए राज्‍य से बाहर मंदिर में जाना वही आपको श्री कृष्‍ण जी मिल जाएगे। उस समय भगवान के पास देवर्षि नारद आऐ और कहने लगे प्रभु अब देरी क्‍यों कर रहे हो। शीघ्र जाइये और माता रूक्मिणी को ले आइये। और उधर शिशुपाल जरासंध की सेना के साथ बारात लेकर विदर्भ देश पहुच गया है।

Rukmini Ashtami Vrat Katha in Hindi
Rukmini Ashtami Vrat Katha in Hindi

विवाह से पहले गिरजा पूजा की पंरम्‍परा है और उसकी पूजा के लिए राजा व रानी ने रूक्मिणी को राज्‍य से बाहर गौरी मंदिर में भेज दिया। देवी रूक्मिणी गौरी पूजा करके श्री कृष्‍ण जी की प्रतीक्षा करने लगी तो देखा की दूर रथ में कृष्‍ण जी आते दिखाई दिए। वहा पहुचने के बाद रूक्मिणी ने भगवान को प्रणाम किया।

कृष्‍ण जी ने कहा देरी ना करो प्रिय जल्‍दी रथ में बैठों हमे शीघ्र ही द्वारीका की लिय निकलना है क्‍योंकि इस राज्‍य में जरासंध व शिुशपाल दोनो की सेना है यह सुनकर राजकुमारी कृष्‍ण जी के साथ रथ में बैठ गई और द्वारीका के लिए चल दिए। जब यह बात रूक्‍म व शिशुपाल को पता चली की रूक्मिणी का हरण कृष्‍ण ने कर लिया और वह उसे अपने साथ द्वारीका ले जा रहा है।

तो अपनी सेना के साथ उनका पीछा करते है किन्‍तु कोई फाइदा नही होता क्‍योंकि उकनो बहुत देरी हो चुकी थी। इधर कृष्‍ण जी रूक्मिणी के साथ द्वारीका पहुच गए और द्वारीका नगरी वालो ने उनका भव्‍य स्‍वागत किया। जिसके बाद पूर रिति-रिवाजों के साथ भगवान कृष्‍ण जी व देवी रूक्मिणी का विवाह हुआ। और कृष्‍ण जी की पहली पत्‍नी देवी रूक्मिणी कहलाई जो स्‍वयं माता लक्ष्‍मी जी का रूप था।

दोस्‍तो आज के इस लेख में हमने आपको रूक्मिणी अष्‍टमी व्रत कथा Rukmini Ashtami Vrat Katha in Hindi के बारे में बताया है। यदि लेख में दी गई जानकारी पसंद आई हो तो लाईक करे व अपने मिलने वालों के पास भेजिए। और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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