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Shanivar Vrat Katha In Hindi | Shanivar Vrath Poojan Vidhi | शनिवार व्रत कथा एवं पूजन की विधि हिन्‍दी में

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Shanivar Vrath Katha Padhe | Shanivar Vrat Poojan Vidhi | शनिवार व्रत कथा एवं पूजन की विधि | श‍निवार का व्रत कैसे रखे | Shanivar Vrath Karne Ke Fayde | Shanivar Vrat Kaise Kare in Hindi

Shanivar Vrat Katha:- आप सभी जानते है कि हमारे हिन्‍दु धर्म मे अनेक देवी-देवताओं एवं ग्रहों की पूजा की जाती है। अपने ऊपर आए सकंट को खत्‍म करने तथा देवी-देवताओं को प्रसन्‍न करने के लिए लोग इनका व्रत रखते है तथा इनकी पूजा करते है। आज के इस लेख में हम आपको शनिवार व्रत कथा, शनिदेव व्रत कथा एवं पूजन विधि के बारे में विस्‍तार से बताएगे।

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जैसा कि आप सभी जानते हो कि भगवान शनि देव को हमारे धर्म में ग्रहों का राजा माना जाता है। इसके साथ ही भगवान शनिदेव को कई अन्‍य नामों – सूर्य पुत्र शनिदेव, छाया पुत्र शनिदेव एवं न्‍याय का देवता आदि नामों से भी जाना जाता है। भगवान शनिदेव हमारे अच्‍छे एवं बुरे कर्मो के हिसाब से मनुष्‍य का उसका फल देते है।

Shanivar Vrat Katha

ऐसा माना जाता है कि भगवान शनिदेव को बड़ी जल्‍दी क्रोध आ जाता है। वेदो एवं शास्‍त्रों में लिखा हुआ है कि जो भी मनुष्‍य शनिदेव जी की पूजा पाठ करते है या फिर शनिदेव का व्रत (Shanidev Ka Vrat) रखते है तो शनिदेव उनकी सभी तरह की मनोकामनाओ को पूरा करते है। ऐसे में कहा जा सकता है कि जिस इन्‍सान पर सकंट आया हुआ है तो उसे भगवान शनिदेव को प्रसन्‍न करने के लिए शनिवार का व्रत रखकर व्रत कथा का पाठ (Shanivar Vrat Katha) करना चाहिए। इस व्रत के रखने से उसके सकंट दूर होते है।

ऐसे में अगर आप भगवान शनिदेव जी व्रत करते है या फिर उन्‍हे प्रसन्‍न करना चाहते है तो आप उनका व्रत कर सकते है। आज के इस लेख में हम आपको शनिवार का व्रत रखने की विधि, श‍निवार व्रत की पूजन विधि एवं शनिवार व्रत कथा के बारे में बताने जा रहे है इसलिए आप इस लेख में दी गई श‍निवार व्रत कथा का पूरा पाठ करे।

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शनिवार व्रत के लिए पूजन की सामग्री

  • काला तिल,
  • काला वस्‍त्र,
  • तेल,
  • काली चना दाल,
  • उड़द,
  • लॉग,
  • तुलसी,
  • काला नमक,
  • तेल का दीपक,
  • नीले लाजवन्‍ती के पुष्‍प,
  • आकड़े के पत्ते,

ऐसे रखे शनिवार का व्रत | Shanivar Ka Vrat Kaise Kare

शनि दोष को दूर करने के लिए आप Shaniwar Ka Vrat आप चाहे तो कभी भी शुरू कर स‍कते है। किन्‍तु जो भी व्‍यक्ति इस व्रत को श्रावण के महिने से शुरू करता है। तो उसकी सभी मनोकामनाए बहुत जल्‍दी ही पूरी हो जाती है। शनिवार का व्रत करने वाले व्‍यक्ति को सुबह जल्‍दी उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर, भगवान सत्‍यनारायण को पानी चढाना चाहिऐ। इसके बाद पीपल के पेड़ में तथा तुलसी के पेड़ में भी पानी चढ़ना चाहिऐ।

इसके बाद आपको भगवना शनिदेव के मंदिर में जाकर सबसे पहले उन पर फूल चढाना चाहिऐ। फिर तेल चढ़ाकर शनिदेव की मूर्ति के आगे तेल का दीपक जलाकर पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिऐ। पूजा करने के बाद शनि महारा को भाेग लगाकर Shanivar Vrat Katha पढ़नी चाहिऐ या फिर किसी अन्‍य से सुननी चाहिऐ। कथा सुनने के बाद आपको भगवान शनिदेव की आरती करनी चाहिऐ। इस दिन व्‍यक्ति को एक समय भोजन करना चाहिऐ तब जाकर उसको व्रत पूर्ण होता है।

Shanivar Vrat Katha In Hindi | शनिवार व्रत की कथा

Shanivar Vrat Katha In Hindi | Shanivar Vrath Poojan Vidhi | शनिवार व्रत कथा एवं पूजन की विधि हिन्‍दी में
Shanivar Vrat Katha

आइये अब आपको शनिवार के व्रत की कथा ( Shanivar Vrat Ki Katha ) के बारे में विस्‍तार से बताते है। यह कथा राजा विक्रमादित्‍य और एक राजकुमारी तथा भगवान शनिदेव की है जो कि इस प्रकार है:-

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राजा विक्रमादित्‍य के पास सभी ग्रहों का आना

एक बार सूर्य, चन्‍द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्‍पति, शुक्र, शनि, राहू, और केतु इन सभी ग्रहों में आपस में झगडा हो गया, कि हम सब में से सबसे बड़ा कौन है। जब आपस में कोई निर्णय नहीं हुआ तो वे सभी आपस में झगते हुऐ देवताओ के राजा इन्‍द्र के पास पहुचे। और कहने लगे की आप तो सब देवताओ के राजा है, इसलिए आप हमारा निर्णय करके बताओ। हम सभी नवों ग्रहों में से सबसे बड़ा कौन है। राजा इन्‍द्र इनका प्रश्‍न सुनकर घबरा गये, और कहने लगे कि मुझमें यक सामर्थ्‍य नहीं है जो कि किसी को बड़ा या छोटा बता सकूँ।

मैं अपने मुह से कुछ नही कह सकता, परन्‍तु एक आदमी तुम्‍हारे इस प्रश्‍न का जवाब दे सकता है। वह राजा विक्रमादित्‍य है जो पृथ्‍वी पर निवास करता है और दूसरो के दुखो को निवारण करता है। इसलिए तुम सब मिलकर राजा विक्रमादित्‍य के पास जाओ, वही तुम्‍हारे प्रश्‍नो के उत्तर देगे। ऐसा सुनकर सभी ग्रह राजा विक्रमादित्‍य के पास चले गये, और वहॉ जाकर अपना प्रश्‍न राजा के सामने रखा।

राजा उनकी बात सुनकर बड़ी चिन्‍ता में पड़ गया कि मैं अपने मुख से किसको बड़ा और किसको छोटा बताउ। जिसको छोटा बताउगा वही क्रोध करेगा। परन्‍तु इनका निर्णय तो करना पड़ेगा। तब राजा ने सोना, चॉंदी, कांसा, पीतल, शीसा, रांगा, जस्‍ता, अभ्रक और लोहा सभी नवों धातुओ के नौ आसन बनवाये। और सभी को क्रम के अनुसर बिछा दिया। अब राजा ने सभी ग्रहो से कहा कि आप सब अपने-अपने सिंहासनों पर बैठिऐ जिसका आसन सबसे आगे होगा वह सबसे बड़ा और जिसका सबसे पीछे है। वह सबसे छोटा होगो और लोहा सबसे पीछे था।

राजा विक्रमादित्‍य पर शनिदेव का कोप

वह शनिदेव को आसन था इसलिए शनिदेव ने समझ लिया कि राजा ने मुझको सबसे छोटा बना दिया। इस पर भगवान शनिदेव को बहुत क्रोध आया और कहा कि राजा तु मेरे पराक्रम को नी जानता। सूर्य एक राशि पर एक महिना, चन्‍द्रमा सवादो महिने दो दिन, मंगल ड़ेढ़ महीना, बृहस्‍पति  तेरह महिने, बुध तथा शुक्र एक महिने किन्‍तु मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक रहता हॅू। मैने बड़े-बड़े देवताओ को भीषण दुख दिये है।

सुनो राजन! रामजी को साढ़े साती आयी और बनवास हो गया, औार रावण पर आई तो राम और लक्ष्‍मण ने लंका पर चढ़ाई कर दी। और उसके कुल का नाश हो गया। हे राजा अब तुम सावधान रहना। इस पर राजा ने कहा जाे कुछ मेरे भाग्‍य में है वाे तो होकर ही रहेगा। और शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहा से चले गये। कुछ दिन बीत गऐ, और जब राजा पर साढ़े साती की दशा आयी तो शनिदेव घोड़ो के सौदागार बनकर अनेक सुन्‍दर घोड़ो के साथ राजा के राज्‍य में आया।

जब राजा ने सौदागार के आने की खबर सुनी तो अश्‍वपाल को अच्‍छे-अच्‍छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। अश्‍वपाल घोड़े की ऐसी नस्‍ल देखकर उनका मूल्‍य पूछा। सोदागार ने घोड़ो का मुल्‍य बताया तो मूल्‍य सुनकर अश्‍वपाल चकित रह गया। और वह तुरन्‍त राजा के पास गया और घोड़ो का मुल्‍य बताया। तब राजा ने एक घोडा पसंद किया और सवारी  के लिए उस पर चढ़ा। राजा के घोड़े की पीठ पर चढते ही घोड़ा जोर से भागा, और एक दूर जगंल में जाकर राजा को छोड़कर अन्‍तर्ध्‍यान हो गया। यह देखकर राजा घबरा गया और वह इधर-उधर भटकने लगा।

विक्रमादित्‍य के हाथ पैर काट देना

राजा को भूख और प्‍यास लगने लगी वह दुखी होकर भटकते हुऐ आगे बड़ा तो उसने एक ग्‍वाले को देखा। ग्‍वाले ने राजा विक्रमादित्‍य को इस तरह देखकर उसको पानी पिलाया। पानी पीने के बदले में राजा ने उस ग्‍वाले को अपनी अगूंठी दे दी। और शहर की ओर चल दिया। राजा शहर में पहुच कर एक सेठ की दुकान पर बैठ गया और अपने आपको अज्‍जैन का रहने वाला तथा अपना नाम वीका बताया। सेठ ने उसे कुलीन आदमी समझकर जल आ‍दि पिलाया। भाग्‍यवश उसी दिन सेठ की दुकान पर बिक्री बहुत ज्‍यादा हुई।

सेठ ने उसे भाग्‍यवान पुरूष समझकर अपने घर ले गया। भोजन के लिए बिठा दिया, भोजन करते समय राजा ने आश्‍चर्य की बात देखी कि खूंटी पर हार लटक रहा है वह उसे निगल रही है। कुछ देर बाद वहा सेठ आया तो देखा की खूटी पर टंगा होर गायब है,तो उसने सोचा की वीका ने ही हार चुराया है। और वह वीका से हार मागां तो वीका ने बोला मैने हार नही चुराया। इस पर सेठ ने उसे फौजदार के हवाले कर दिया, और फौजदान ने उसे राजा के सामने उपस्थ्ति कर दिया।

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राजा ने उसे देखकर कहा ये आदमी तो भला प्रतीत होता है चोर नही लगता, तब सेठ ने कहा की इसके सिवाय घर में कोई भी नही था। इसी ने हार की चोरी की है महाराज। राजा ने उसे सजा के तौर पर उसके हाथ-पैर कटवाकर चौरंगिया करवा दिया। और उसे एक सुनसान जगह पर फेक दिया। कई दिनो बाद वहा से एक तेली जा रहा था, तो उसने वीका को लावरीस अवस्‍था में पड़ा देखकर उस पर दया आ गयी। और वीका को अपने साथ घर ले जाने के लिए बैल गाड़ी में कोल्‍हू पर बिठा दिया।

विक्रमादित्‍य के साथ राजकुमारी का विवाह

वीका उस पर बैठा अपनी जुबान से बैल हांकता हुआ तेली के घर पहुच गये। और वह वही पर रहने लगा। कुछ दिनो बाद राजा विक्रमादित्‍य पर से शनिदेव की दशा समाप्‍त हो गई। एक दिन वर्षा ऋतु के समय रात को वह मल्‍हार राग गाने लगा। उसका गाना सुनकर उस शहर के राजा की कन्‍या उस राग पर मोहित हो गयी। और अपनी दासी को उस आदमी का पता करने के लिए भेजा जो यह गाना गा रहा था।  राजकुमारी की दासी उसे ढूढती हुयी उसी तेली के घर जा पहुची जहा पर वह गा रहा था। दासी ने देखा कि तेली के घर के बाहर एक चौरंगिया राग गा रहा है।

वह तुरन्‍त महलो में आकर राजकुमारी को सारा वृतान्‍त सुना दिया। बस उसी क्षण राजकुमारी ने अपने मन ही मन में उसे अपनी पति चुन लिया और यह प्रण कर लिया चाहे कुछ भी हो मैं इस चौरंगिया के साथ ही विवाह करूँगी। प्रात:काल होते ही दासी ने जब राजकुमारी को जगाना चाहा तो राजकुमारी अनशन व्रत लेकर पड़ी रही। तब दासी ने रानी के पास जाकर सारा वृत्‍तान कह दिया, रा‍नी तुरंत वहा आकर राजकुमारी को जगाया। और उसके दुख का कारण पूछा, तो राजकुमारी ने कहा कि मां मैने यह प्रण कर लिया है कि तेली के घर में जो चौरंगिया है मैं उसी के साथ विवाह करूगी।

यह सुनकर उसकी माता ने कहा पगली यह क्‍या बात कर रही है तेरा विवाह तो किसी देश के राजा के साथ किया जाऐगा उस चौरंगिया के साथ नही। यह सुनकर राजकुमारी ने कहा की माता मैने उसको अपने मन ही मन में अपनी पति चुन लिया है। तब रानी ने यह बात राजा को बताई, तो राजा ने भी उसे बहुत समझाया की तुम्‍हारा विवाह तो किसी बडे राजकुमार और रूपवान व गुणी के साथ करूगां। ऐसी बात तुमको कभी नहीं विचारनी चाहिए।

राजकुमारी ने कहा – “पिताजी मैं अपने प्राण त्‍याग दूंगी परन्‍तु किसी और से विवाह नहीं करूगी”! इतना सुनकर राजा ने क्रोध में कहा यदि तेरे भाग्‍य में ऐसा ही लिखा है तो जैसी तेरी इच्‍छा हो वैसा ही होगा। राजा ने तेली को दरबार में बुलाकर कहा तेरे घर पर जो चौरंगिया है उसके साथ मैं अपनी बेटी का विवाह करूगां। राजा की बात सुनकर तेली ने कहा महाराज यह कैसे संभव है। आप तो एक राजा है और हम एक नीचे कुल के तेली है। किन्‍तु राजा ने कहा कि भाग्‍य मे जो लिखा है उसे कोई नही टाल सकता। अपने घर जाकर विवाह कि तैयाी करो।

राजा विक्रमादित्‍य के हाथ पैर वापिस आना

राजा ने अपनी पुत्री का विवाह पूरे रिती-रिवाज से चौरंगिया बना राजा विक्रमादित्‍य के साथ कर दिया। और वो दोना साथ-साथ महल में ही रहने लगे। रात्रि के समय जब राजा विक्रमादित्‍य और राजकुमारी महल में सोये हुऐ थे, तो आ‍धी रात  में विक्रमादित्‍य के सपनों में भगवान शनिदेव आये। और कहने लगे देख लो राजा मुझको छोटा बताकर तुमने कितना दुख उठाया है। यह सुनकर राजा विक्रमादित्‍य ने शनिदेव के पैरो में गिरकर क्षमा मांगी।

भगवान शनिदेव ने प्रसन्‍न होकर विक्रमादित्‍य के हाथ पैर दे दिये। यह देख राजा विक्रमादित्‍य ने कहा हे भगवन मेरी आप से प्रार्थना है कि जैसा दुख आपने मुझे दिया है, वैसा किसी और को मत देना। शनिदेव ने कहा तुम्‍हारी यह प्रार्थना स्‍वीकार है। और कहा इस संसार में जो कोई मनुष्‍य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा उसे मेरी दशा में कभी किसी प्रकार का दुख नहीं होगा। और जो नित्‍य ही मेरा ध्‍यान करेगा, या चींटियों को आटा डालेगा उसके सभी मनोरथ पूर्ण होगे। इतना कहकर शनिदेव अपने धाम चले गऐ।

राजकुमारी की आखँ खुली और उसने अपने पति के हाथ पैर सही सलामत देखे तो वह आश्‍चर्य में पड़ गयी। तब राजा विक्रमादित्‍य ने अपना सारा वृत्‍तान राज‍कुमारी को सुना दिया। और कहा कि मैं उज्‍जैन का राजा विक्रमादित्‍य हूँ। यह सुनकर राजकुमारी बहुत ही प्रसन्‍न हुयी और सुबह होते यह बात उसने अपने माता-पिता और सखियो को बतायी। तो सभी प्रसन्‍न हुऐ। जब उस सेठ ने यह बात सुनी तो वह दौड़कर राजा विक्रमादित्‍य के चरणों में आ गिरा, और क्षमा की भिख मागंने लगा।

कहा मैने आप पर चोरी का झूठा आरोप लगाया है आप जाे चाहे मुझे दण्‍ड़ दे सकते है मैं पाने के लिए तैयार हूँ। सेठ की बात सुनकर राजा ने कहा सेठ तुम्‍हारी कोई गलती नही है मुझ पर शनिदेव को कोप था इसी कारण ये सब हुआ। इसमे तुम्‍हारा कोई दोष नही है तुम घर जाकर अपना कार्य करो। सेठ बोला मुझे तब शांति मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर प्रीतिपूर्वक भोजन करोगें। राजा ने कहा जैसी आपकी मर्जी वैसा ही होगा।

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विक्रमादित्‍य का विवाह सेठ की पुत्री के साथ

सेठ अपने घर जाकर अनेक प्रकार के पकवान बनवाये और राजा विक्रमादित्‍य को खाने पर बिठाया। आश्‍चर्य की बात यह है कि जिस समय राजा विक्रमादित्‍य भोजन कर रहे थे उसी समय जो खूंटी पहले हार निगल गई थी, वह अब हार उगल रही है। जब भोजन समाप्‍त हो गया तब सेठ ने हाथ जोड़कर कहा महाराज मेरे एक श्रीकंवर नाम की कन्‍या है उसका पणिग्रहण मैं आप के साथ करना चाहता हूँ। राजा विक्रमादित्‍य का विवाह उसे सेठ की बेटी श्रीकंवर के साथ हो गया। विदाई के समय सेठ ने राजा को बहुत कीमती वस्‍तुये और धन दिया।

इस प्रकार कुछ दिनों तक वहां निवास करने के पश्‍चात विक्रमादित्‍य ने अपने राज्‍य उज्‍जैन जाने को कहा। और सभी से विदा लेकर अपनी दोनो पतनीया राजकुमारी मनभावी, और श्रीकंवरी के साथ तथा अनेक दास-दासियो के साथ उज्‍जैन की ओर चल दिऐ। जब वो अपने राज्‍य के निकट जा पहुचें तो पुरवासियों ने राजा के आने का समाचार पूरे उज्‍जैन में फैला दिया। वहा की प्रजा अपने राजा की आने की खबर सुनकर उनके स्‍वागत के लिए पूरे शहर को पुष्‍पों और दीपको से सजा दिया।

विक्रमादित्‍य का अपने राज्‍य में वापिस आना

राजा ओर उसकी दोना प‍तनीयों का भव्‍य स्‍वागत किया, और तो अपने महल में पधारे। पूरे दिन शहर में भारी महोत्‍सव मनाया गया और रात्रि को दीपमाला की गई। दूसरे दिन राजा विक्रतादित्‍य ने पूरे श‍हर में यह घोषणा करावायी की सभी ग्रहों में से सबसे बड़ा ग्रह शनिदेव है। मैने उन्‍हे छोटा बताया इसी कारण मुझे ये सब दुख प्राप्‍त हुऐ।  तो पूरे शहर में आज से Shanivar Vrat Katha करेगे। और सदा शनिश्‍चर की पूजा करेगे।

राजा और प्रजा अनेक प्रकार के सुख भोगती हुयी रही। शनिदेव की कृपा से सभी के दुख दूर हो जाते है ओर शनिवार की कथा को व्रत के दिन अवश्‍य पढ़ना चाहिए। ओउम शान्ति!! ओउम शान्ति!!। तब से लेकर आज तक लोग भगवान शनिदेव को प्रसन्‍न करने के लिए Shaniwar ka Vrat और Katha करते है।

प्‍यारे दोस्‍तो आज की पोस्‍ट में आपको Shanivar Vrat Katha के बारे में बताया है। अगर आपको हमारी पोस्‍ट पंसद आयी हो तो इसे अपने सभी दोस्‍तो व मिलने वालो के पास शेयर करे ताकी वो भी दसे पढ़कर या सुनकर अपना शनिवार का व्रत पूरा कर सके।और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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