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Varaha Chaturdashi Vrat Katha in Hindi | वाराह चतुर्दशी व्रत कथा व पूजा विधि यहा से जाने

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Varaha Chaturdashi Vrat Katha | Chaturdashi Katha in Hindi |वाराह चतुर्दशी कथा | वाराह चतुर्दशी व्रत की कथा

आप सभी जानते है हिन्‍दी पंचाग के अनुसार प्रतिमहीने में दो चतुर्दशी आती है। जो अपने आप में खास महत्‍व रखती है । किन्‍तु आज हम बात करेगे वाराह चतुर्दशी की जो प्रतिवर्ष आश्विन महीने की शुक्‍लपक्ष की चतुर्दशी (चौदश) को आती है। जो इस बार 19 अक्‍टूबर 2021 मंगलवार के दिन पड़ रही है।

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आपको बता दे विष्‍णु पुराण के अनुसार इस चतुर्दशी वाले दिन भगवान विष्‍णु जी ने वाराह अवतार लिया था। जिस कारण इसका नाम वाराह चतुर्दशी पड़ गया। इस दिन औरते वाराह भगवान के लिए व्रत रखती है और उनकी पूजा अर्चना करती है। ऐसे में आप भी वाराह चतुर्दशी का व्रत रखते है तो पोस्‍ट में दी गई व्रत कथा व पूजा Varaha Chaturdashi Vrat Katha विधि को पढ़कर या फिर किसी अन्‍य से सुनकर आप अपना व्रत पूर्ण कर सकती है। तो पोस्‍ट के अन्‍त तक बने रहे।

Varaha Chaturdashi (वाराह चतुर्दशी का शुभ मुहूर्त)

Varaha Chaturdashi Vrat Katha
Varaha Chaturdashi Vrat Katha

हिन्‍दी पंचाग के अनुसार वाराह चतुर्दशी इस बार 19 अक्‍टूबर 2021 की है। जिसकी शुरूआत 18 अक्‍टूबर 2021 सोमवार को शाम 06:10 मिनट से हो जाऐगी। तथा 19 अक्‍टूबर 2021 को शाम 07:05 मिनट पर समाप्‍त हो जाऐगी।

  • ब्रह्मा मुहूर्त:- प्रात:काल 04:49 से लेकर 05:39 मिनट तक
  • अभिजित मुहूर्त:- सुबह 11:48 से लेकर दोपहर के 12:33 तक
  • गोधूलि मुहूर्त:- शाम 05:40 से लेकर 06:05 तक
  • अमृत काल:- सुबह 07:08 से लेकर 08:50 तक
  • सर्वार्थ सिद्धि योग:- सुबह 06:30 से लेकर दोपहर 12:13 तक

नोट:- आपकी जानकारी के लिए बता दे की इस व्रत वाले दिन 19 अक्‍टूबर को दोपहर 03 बजे से लेकर 04:25 मिनट तक राहुकाल रहेगा। तो आप इस अशुभ मुहूर्त के बीच में कोई भी शुभ कार्य ना करे।

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वाराह चतुर्दशी का महत्‍व (Varaha Chaturdashi Mhatva)

वाराह चतुर्दशी का व्रत आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की चर्तुदशी को किया जाता है। इस तिथि को भगवान वाराह (विष्‍णु जी) की पूजा करने का विधान है। कहते है की इस दिन भगवान विष्‍णु जी ने हिरण्‍याक्ष नामक राक्षस को मारने के लिए वाराह का अवतार लिया था। और उसे मारकर इस पृथ्‍वी का मुक्‍त कराया था।

इस संसार में जो कोई स्‍त्री व पुरूष इस दिन भगवान वाराह की प्रतिमा को गंगाजल से स्‍नान कराकर पूरे विधि-विधान से पूजा करता है। तथा उसके बाद भोग लगाकर आरती करते है तो उसकी सभी इच्‍छाए पूर्ण होती है।

वाराह चतुर्दशी व्रत पूजा की सामग्री

  • गंगा जल
  • कलश
  • रौली-मौली
  • चावल, कपूर, धागा
  • पुष्‍प व फल
  • लाल रंग का कपड़ा
  • धूप व दीप
  • पंचामृत

वाराह चतुर्दशी व्रत पूजा विध‍ि (Varaha Chaturdashi Vrat Puja Vidhi)

  • वाराह चतुर्दशी का व्रत रखने वाले स्‍त्री व पुरूष को प्रात:काल ब्रह्मा मुहूर्त में उठकर स्‍नान आदि से मुक्‍त होकर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करे।
  • जिसके बाद भगवान सूर्य को पानी चढ़ाकर पीपल व तुलसी के पेड़ में भी पानी चढ़ाऐ।
  • इसके बाद घर पर किसी साफ स्‍थान पर एक चौकी बिछाकर उस पर लाल रंग का वस्‍त्र बिछा देना है।
  • अब इस चौकी के ऊपर भगवान वाराह की प्रतिमा स्‍थापित करे और उसके दूसरी तरफ जल से भरा हुआ मिट्टी का कलश/लौटा रखे।
  • इसके बाद भगवान वाराह (विष्‍णु जी) की प्रतिमा को गंगा जल से स्‍नान करवाऐ और भगवान को धूप, दीप, पुष्‍प आदि चढ़ाऐ।
  • यह सब चढ़ाने के बाद भगवान का पंचामृत से अभिषेक जरूर करे।
  • पूजा के दौरान इस महामंत्र का जाप तीन बार करे:-

ऊँ वराहय नम:। ऊँ सूकराय नम: । ऊँ धृतसूकररूपकेश्‍वाय नम: । इन तीनो में से किसी एक महामंत्र का जाप करे।

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  • जिसके बाद अपने दोनो हाथ जोड़कर वाराह चतुर्दशी व्रत कथा (Varaha Chaturdashi 2021) सुने। कथा सुनने के बाद आरती करे तत्‍पश्‍चात भगवान को प्रसाद चढाकर बाट देना है।
  • इसके बाद किसी एक ब्राह्मण को भोजन कराकर यथा शक्ति दान-दक्षिणा करे। जिसके बाद स्‍वयं एक समय भोजन ग्रहण करे।

वाराह चतुर्दशी व्रत कथा (Varaha Chaturdashi Vrat Katha)

विष्‍णु पुराण के अनुसार सत्‍युग में महर्षि कश्‍यप की धर्म पत्‍नी देवी दिति ने दो पुत्रों को जन्‍म दिया। जिनका नाम हिरण्‍याक्ष और किरण्‍यकशिपु था। किन्‍तु वो दोनाें दैत्‍य होने के कारण जन्‍म लेते ही उन्‍होने अपना व्‍यस्‍क रूप धारण कर लिया। जिससे पूरी सृष्टि में हलचल मच गई। क्‍योकि वो दोनो बहुत ही शक्तिशाली और बलवान थे।

उन दोनो राक्षसो ने ब्रह्माजी की घोर तपस्‍या करके ब्रह्माजी से सबसे शक्तिशाली बनने का से वरदान प्राप्‍त किया। जिसके बाद दोनो राक्षस अपनी शक्ति का बल दिखाते हुए देवलोक पर अपना आधिपत्‍य जमा लिया। और सभी देवगणो पर अत्‍याचार करने लगे। इसके बाद एक दिन हिरण्‍याक्ष ने पृथ्‍वी को चुराकर रसातल में छिपा दिया।

पृथ्‍वी को हरण करने से पूरी सृष्टि में उथल-पथल मच गई और सभी ऋषि व मुनि तथा देवतागण भगवान विष्‍णु जी के पास सहायता के लिए गए। और कहा हे प्रभु यदि वह पृथ्‍वी को वापस नही देगा तो पूरी सृष्टि का विनाश हो जाऐगा। जब भगवान विष्‍णु जी ने अपना वाराह अवतार धारण किया पृथ्‍वी को अपने दोनेा दांतो पर उठाकर रसातल से बाहर निकाला। और अपने कक्षा में स्‍थापित कर लिया।

यह सब देखकर हिरण्‍याक्ष राक्षस क्रोध में आग-बबूला हो गया और भगवान वाराह को युद्ध के लिए ललकारा। जिसके बाद दोनो में भंयकर युद्ध हुआ किन्‍तु अंत में भगवान विष्‍णु जी (वाराह) ने उस अत्‍याचारी व अहंकारी राक्षस को मारकर उसका उद्धार किया। क्‍योकि हिरण्‍याक्ष और हिरण्‍यकशिपु दोनो राक्षस पूर्व जन्‍म में भगवान विष्‍णु जी के लोक के द्वारपाल थे।

किन्‍तु ऋषि का आदर शतकार नही करने के कारण दोनो को अगले जन्‍म में राक्षस की योनी होने का श्राप दिया था। तब दोनो द्वारपाल ऋषि के पैरो में पड़कर माफी मांगने लगे और कहा हे प्रभु हमारो उद्धार कैसे होगा। तब उस ऋषि ने बताया की तुम दोनो का उद्धार भगवान स्‍वयं विष्‍णु जी करेगे।

वाराह चतुर्दशी व्रत का फल

पुराणो में कहा गया है की जो कोई मनुष्‍य वाराह चतुर्दशी का व्रत पूरे विधि-विधान व श्रद्धा भाव से करेगा तो उसकी समस्‍त मनोकामनाए पूरी होगी। और उसे भूत प्रेतादि बाधाऐ नष्‍ट हो जाऐगी। वह मनुष्‍य इस जन्‍म में सुख व आनंद का जीवन व्‍यतीत करके अन्‍त में प्रभु के श्री चरण कमलो में स्‍थाप प्राप्‍त करेगा।

दोस्‍तो आज के इस लेख में हमने आपको वाराह चतुर्दशी व्रत Varaha Chaturdashi Vrat Katha के बारे में सम्‍पूर्ण जानकारी प्रदान की है। यदि ऊपर लेख में दी गई जानकारी पसंद आई हो तो लाईक करे व अपने मिलने वालो के पास शेयर करे। और यदि आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद दोस्‍तो……

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