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Vat Savitri Vrat Katha In Hindi | वट सावित्री व्रत कथा व पूजा विधि यहा से जाने

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Vat Savitri Vrati Katha in Hindi वट सावित्री का व्रत प्रतिवर्ष ज्‍येष्‍ठ मास की कृष्‍णपक्ष की अमावस्‍या को किया जाता है। यह स्त्रियों का एक महत्‍वपूर्ण पर्व है। जो बड ही उत्‍साह से मनाती है व इसका व्रत रखती है। इस दिन सत्‍यवान सात्रित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। क्‍योकि माता सावित्री ने धर्मराज यमराज से अपने मृतक पति को छुडाया था। और तभी से लेकर आज तक वट सावित्री का व्रत किया जा रहा है।

इस दिन स्‍त्रीयो के लिए बड़ा ही महत्तपूर्ण दिन होता है। क्‍योकिं इसी दिन किसी समय में सत्‍यवान सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले लिऐ थे। उसी दिन से लेकर आज तक स्‍त्रीया अपने-अपने पतियों की लम्‍बी उम्र के लिए यह व्रत करती है। इस व्रत पर सत्‍यावान सावित्री व यमराज की पूजा की  जाति है। अगर आप भी अपने पति की लम्‍बी उम्र की कामना के लिए Vat Savitri Vrat रखती है तो आज की इस पोस्‍ट के माध्‍यम से वट सावित्री व्रत कथा ( Vat Savitri Vrat Katha ) के बारे में विस्‍तार से बताएगे। इसलिए आप इसे पूरा जरूर पढ़े।

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Vat Savitri Vrati Katha in Hindi
Vat Savitri Vrati Katha in Hindi

पूजा के लिए आवश्‍यक सामग्रींया

Vat Savitri Vrat की पूजा के लिए निम्‍नलिखित सामग्रीया है जो की इस प्रकार है।

  • रौली व मौली,
  • चावल,
  • घी का दीपक,
  • फूल,
  • कच्‍चा सूत,
  • धूप,
  • भिगोये हुऐ चनें,
  • एक लौटा जल,
  • अगरबत्ती,
  • कपूर,
  • चन्‍दन,
  • फल,
  • वट के पत्ते,
  • एक लाल कपडा,

पूजा विधि

Vat Savitri Vrati in Hindi वाले दिन महिलाओ को प्रात:काल जल्‍दी उठकर अपने घर की साफ-सफाई आदि से मुक्‍त होकर स्‍नान करना चाहिऐ। इसके बाद सूर्य भगवान को जल  चढ़ाकर पीपल के पेड़ में भी चढा़ना चाहिऐ। इसके बाद व्रत करने वाली औरते अपना 16 श्रृगांर करके किसी नजदिकी वट के वृक्ष के नीचे मिटटी की बनी सावित्री व सत्‍यवान और भैंसे पर सवार यमराज की प्रतिमा स्‍थापित करनी चाहिऐ।

इसके बान उनकी पूरे विधि-विधान सहित पूजा करनी चाहिऐ। पूजा करने के बाद जल से वट वृक्ष को चारो ओर से सीचंना चाहिऐ। इसके बाद औरत को वट के पेंड़ के चारो ओर कच्‍चा धागा लपेट कर तीन परिक्रमा करनी चाहिऐ। परिक्रमा करने के बाद भीगे हुऐ चनों का बायना निकालकर उस पर यथाशक्‍ति रूपये रखकर अपनी सासुमॉं को देकर उनके चरण स्‍पर्श करना चाहिए।

वट सावित्री व्रत कथा Vat Savitri Vrati Katha in Hindi

प्राचीन काल की बात है एक मद्र नामक देश जिस पर अश्‍वपति नाम का राजा राज करता था उसके कोई सन्‍तान नही होने के कारण वह बहुत दुखी रहता था। एक दिन उनके राज्‍य में एक ऋषि महात्‍मा आऐ, राजा ने उस महात्‍मा का बहुत आदर सत्‍कार किया और भोजन कराया। तब ऋषि ने पूछा हे राजन तुम्‍हारे पास सबकुछ है फिर भी तुम दुखी क्‍यो हो। महात्‍मा की बात सुनकर राजा बोला भगवन मेरे पास सबकुछ है किन्‍तु मेरे कोई भी सन्‍तान नही है। अगर कोई उपाय हो तो बताइये।

राजा की यह बात सुनकर ऋषि ने कहा हे राजन तुम और तुमहारी पत्तनी देवी सावित्री का व्रत करोगें तो तुम्‍हारी इच्‍छा जरूर पूर्ण होगी। राजा अश्‍वपति ने पत्‍नी सहित सन्‍तान प्राप्‍ति के लिए देवी सावित्री का सभी विधि पूर्वक व्रत तथा पूजा करी। उनकी इस भक्‍त‍ि से प्रसन्‍न होकर सावित्री देवी ने उन्‍हे पुत्री होने का वर दिया। और 9 महिने बाद राजा अश्‍वपति के यहा एक सर्वगुण समपन्‍न सुन्‍दर सी कन्‍या ने जन्‍म लिया।

सत्‍यवान को अपना पति चुनना

राजा ने अपनी कन्‍या का नाम सावित्री रख दिया। जब सावित्री युवा हुई तो राजा अश्‍वपति ने अपने मंत्रीयो के साथ उसे अपना पति चुननें के लिए भेज दिया। सावित्री अपने वर का चयन कर घर लौटी तो उसी समया देवर्षि नारद जी उनके यहॉं पधारे। नारद जी ने सावित्री से पूछा की किसे अपने पति रूप में चुना है। सावित्री ने कहा, “हे महाराज मैने अपने पति रूप में राजा द्यमत्‍सेन के पुत्र सत्‍यवान की कीर्ति सुनकर अपने पति रूप में वरण किया है। राजा अश्‍वपति ने नारदजी से दोनो की जन्‍म कुड़लीया मिलावाई।

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नारदजी ने सत्‍यवान तथा सावित्री की ग्रहों की गणना कर अश्‍व‍पति को बधाई दी। और सावित्री की गुणों की बहुत भूरि-भूरि प्रसन्‍सा की, और बताया कि जब आपकी पुत्रीं की आयु 12 वर्ष हो जाएगी तब सत्‍यवान की मृत्‍यु हो जाएगी। नारदजी की यह बात सुनकर राजा अश्‍वपति का चेहरा मुर्झा गया। और सावित्री को कोई और अपना पति चुननें के लिए कहा, परन्‍तु सावित्री ने कहा पिताजी मैने मन ही मन में सत्‍यवान को अपना पति चुन लिया। मैं किसी अन्‍य को अपने हृदय में स्‍थान नहीं दे सकती।

सत्‍यवान व सावित्री का विवाह

सावित्री ने नारदजी से सत्‍यवान की मृत्‍यु का समय ज्ञात कर लिया। और राजा ने अपनी पुत्री सावित्री का विवाह सत्‍यवान के साथ कर दिया। सावित्री अपने ससुराल गई और वहा जाकर सत्‍यवान से जगंल में रहने के लिए कहा, सत्‍यवान मान गया। वह अपने सास-श्‍वसुर व अपने पति के साथ जगंल में रहने लगे। किन्‍तु नारदजी की बात उसे याद थी। नारदजी के बाताऐ हुऐ दिन से तीन दिन पहले से ही वह Vat Savitri Vrat शुरू कर दिया। नारदीजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्‍यवान लकड़ी काटने के लिए चला तो सावित्री भी अपने सास व श्‍वसुर से आज्ञा लेकर सत्‍यवान के साथ लकड़ीया काटने चल दी।

सत्‍यवान की मृत्‍यु

सत्‍यवान जगंल में पहॅुचकर लकड़ी काटने के लिए पेड़ पर चढ गया। अचानक से उसके सिर में बहुत तेज दर्द होने लगा, वह नीचे उतरा और सावित्री से कहा। सावित्री ने उसे एक बड़ के पेड़ के नीचे अपनी गोद में लिटा लिया। किन्‍तु थोड़ी देर में ही सत्‍यवान के प्राणो को हरने के लिए यमराज वहा आ पहुचे। यमराज सत्‍यवान के प्राणो को लेकर वहा से चल दिया। किन्‍तु सावित्री सत्‍यवान को पेड़ के नीचे लिटाकर यमराज के पीछ-पीछे चल दी। सावित्री को अपने पीछे आते देख यमराज ने उसे लौट जाने को कहा, परन्‍तु उसने लौटने से मना कर दिया। और कहा जहा पति है वहीं पत्‍नी को हाेना चाहिए। यही धर्म और मर्यादा है।

यमराज सावित्री की धर्म निष्‍ठा से प्रसन्‍न होकर बोले मांगो क्‍या वर मागंती हो सिवाय अपने पति के प्राणों काे छोडकर। सावित्री में वरदान में अपने सास व श्‍वसुर की ऑंखो की ज्‍योती और दीर्घायु मागं ली। यमराज तथास्‍तु कहकर आगे बढ़ गये। परन्‍तु सावित्री फिर पीछे-पीछे चल दी यह देखकर यमराज ने उसे फिर लौट जाने को कहा। तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज सावित्री के इस पतिधर्म से खुश हुऐ और कहा मांगो क्‍या वरदान मागंती हो। इस बार सावित्री ने अपने श्‍वसुर का राजपाठ( राज्‍य ) वापिस मागां। यमराज तथास्‍तु कहकर आगे बढ़ा।

सत्‍यवान का पुन: जीचित होना

सावित्री अब भी यमराज के पीछे-पीछे चलती रहीं। और इस बार सावित्री ने 100 पुत्रों की मॉं बननें का वरदान मागां। यमराज तथास्‍तु कहकर आगे बडे तो सावित्री ने कहा, आपने मुझे सौ पुत्रों की मॉं बननें का वरदान तो दे दिया। परन्‍तु प‍ति के बिना मॉं कैसे बनूगीं। अपना तीसरा वरदान पूरा कीजिए। यमराज सावित्री की इस धर्मनिष्‍ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिधर्म से प्रसन्‍न होकर सत्‍यवान के प्राणोंं को अपने पाश से स्‍वतंत्र कर दिया।

सावित्री सत्‍यवान के प्राणों को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुची, जहा सत्‍यवान का मृत शरीर पड़ा हुआ था। सावित्री ने तुरन्‍त सत्‍यवान के प्राणों को उसके शरीर में छोडा और उसी बड़ के पेड़ के चारो तरफ तीन बार परिक्रमा करी तो सत्‍यवान जीवित हो उठा। सावित्री अपने पति को पाकर बहुत ही प्रसन्‍नचित होकर अपने सास व श्‍वसुर के पास पहुॅ़ची। तो देखा की उन्‍हे नेत्र जयोति प्राप्‍त हो गई थी। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्‍य भी वापिस मिल गया। आगे चलकर सावित्री 100 पुत्रों की माता बनी।

इस प्रकार चारो दिशाओ में सावित्री के पतिधर्म के पालन की कीर्ति से गूँज उठा। तब से लेकर आज तक औरते अपने पति की लम्‍बी आयु के लिए Vat Savitri Vrat Katha पूरे विधि विधान से करती है।

दोस्‍तो आज की इस पोस्‍ट में हमने आपको Vat Savitri Vrati Katha in Hindi के बारे में सम्‍पूर्ण जानकारी दी है। यदि आपको बताया हुआ लेख पसंद आया हो तो अपने सभी दोस्‍तो के पास शेयर करे। और आपके मन में किसी भी प्रकार का प्रश्‍न है तो कमंट करके जरूर पूछे। धन्‍यवाद

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